हुस्न के अरजाल में क्या वे फँसा पाए मुझे
गो के कबका हो चुका है इस तरफ़ आए मुझे

फलसफा-ए-इश्क़ ख़ुद जिसको समझ आया नहीं
है सवाल अब यह के वह किस तर्ह समझाए मुझे

काश! जी की ज़ुर्रतों में यह भी हो जाए शुमार
आईना बनकर वो अपने रू-ब-रू लाए मुझे

झेलना क्या कम था मेरा यार ताबानी-ए-शम्स
जो जलाने आ गए अपनों के ही साए मुझे

देखिए ग़ाफ़िल जी! गोया लुट चुका जी का चमन
दे रहे लेकिन तसल्ली फूल मुरझाए मुझे

-‘ग़ाफ़िल’

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