न तू बोलेगा तुझको क्या पुराना याद आता है
तो ले मुझसे ही सुन ले मुझको क्या क्या याद आता है

मुझे तो, रंग में आकर तेरा वह ग़ुस्लख़ाने में
फटे से बाँस जैसा सुर मिलाना, याद आता है

जब अपने सह्न की यारो मुझे है घास छिलवानी
तो अब वह घसछुला बेगार वाला याद आता है

कहीं अब मौज़ में आकर लुगाई से न कह देना
के तू मारी थी जो पहला तमाचा याद आता है

तेरी तो तू कहे ग़ाफ़िल मुझे तो अब शबे हिज़्राँ
न कोई और बस इक तू लड़ाका याद आता है

-‘ग़ाफ़िल’

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