तू नहीं याद तेरी आए क्यूँ
बोल मुझ पर ये सितम हाए! क्यूँ

जी ही जब आए नहीं आपे में
ज़िन्दगी कोई ग़ज़ल गाए क्यूँ

तेरे दर पर भी पहुँच कर साक़ी
आदमी जाम न टकराए क्यूँ

पूछे किस तौर कोई तुझसे अब
यह के कमज़र्फ तुझे भाए क्यूँ

जंगो उल्फ़त में भला ग़ाफ़िल जी
कोई शर्माए तो शर्माए क्यूँ

-‘ग़ाफ़िल’

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