एक शे’र आज के चाँद के नाम-

रुख़ ढकने का लाख जतन पर नक़ाब सरका जाता है
ग़ाफ़िल तो लट्टू हो बैठा चाँद की पर्दादारी पर

-‘ग़ाफ़िल’

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